Monday, November 26, 2018

वीर सावरकर : अनुरोध का सत्य

भारत में राष्ट्रवाद का अन्य विचाधाराओं पर हावी होने के साथ जहाँ  एक ओर विनायक दामोदर सावरकर का विषयवार चर्चा बढ़ा है वही इस स्वरुप के विरोधी अक्सर सावरकर के योगदानों को कम कर आंकते हैं  . ऐतिहासिक तथ्यों का सुविधानुसार उपयोग इस लड़ाई को और भी आंच देता है . ऐसे में सावरकर और भगत सिंह की तुलना करने से भी लोग बाज नहीं आते . इस क्रम में सावरकर द्वारा उनके माफीनामे को घिनौना माना  जाता है . एक आम नागरिक के रूप में राष्ट्रिय महापुरुषों के ऊपर ऐसी चोचलेबाजी कभी-कभी असहनीय हो जाती है .

सावरकर से जुडी घटनाओं पर बारीक़ नजर दें तो सर्वप्रथम जो पांच वर्ष उन्होंने कानून  के छात्र के रूप में लंदन में बिताये , इस दरम्यान क्रन्तिकारी आन्दोलन कर उन्होंने ब्रिटिश सरकार से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की . उन्होंने भारत से यूरोप , यहाँ तक कि अमेरिका में भी  सामान सोच के लोगों का एक नेटवर्क तैयार किया , साथ ही आयरलैंड  , फ़्रांस  , इटली  , रूस  और अमेरिकन नेताओं , क्रांतिकारियों और पत्रकारों  के साथ वैचारिक  सम्बन्ध कायम किये  , जिसके  कारण  ब्रिटिश सरकार  वैश्विक परिदृश्य में चर्चा का विषय बन पाया . इसमें कोई शक नहीं है कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सबसे खतरनाक राजद्रोही के रूप में दर्शाया . चुकि  सावरकर लंदन में अधयन्नरत थे इसीलिए 1881 का भगोड़ा अपराधी अधिनियम उन पर लागू नहीं होता था ,इसलिए उन्हें भारत भेजते हुए यह भी सुनिश्चित किया कि सावरकर को अपना बचाव या अपील करने का मौका न मिले . यहाँ पर उन्हें 2 जन्मों की सजा दी  गयी , कुल 50 साल . उनके बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर के साथ उन्हें अंडमान के सेल्लुलर जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया . 2 जन्मों की कैद , वो भी तब जब ब्रिटिश इसाई धर्मब्लाम्बी थे और  दुसरे जन्म में उनका  विश्वास नहीं होता   . ब्रिटिश दस्तावेज  बताते हैं कि वो लोग सावरकर की उपस्थिति से कितने डरे हुए थे , इसलिए यथा संभव उन्हें भारत की मुख्य भूमि से दूर रखने का प्रयास किया गया .

सेल्लुलर जेल में  उन्हें हर संभव यातना से गुजारा गया . जंजीरों से बांध कर उल्टा लटकाना , उनकी देशभक्ति के लिए गरियाना , मील में बैलों  की तरह बांध कर कोल्हू खिंचवाना , इसके बाद हर जरुरी सुविधा जैसे कि टॉयलेट और पानी से दूर रखना , सड़ा हुआ खाना देना बल्कि खाने में मक्खी और जोंक के टुकड़े दिए जाते थे . यह पूरी तरह से राक्षसों को कैद करने वाली जगह  थी .

1913 में सावरकर ने दुसरे कैदियों के साथ मिल कर अमानवीय व्यवहार के खिलाफ जेल में भूख हरताल और असहयोग की शुरुआत कर दी . बांकी भारत अपने साथियों को मिल रहे सजा के बारे में बिलकुल अनभिज्ञ  था . इसी बीच इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट लीक हुयी कि सावरकर अपने साथियों के साथ मिल कर जेल में ही बम बनने की योजना पर काम कर रहे थे . बात ऊपर तक गयी तो अक्टुबर 1913 को  सर रेगीनाल्ड एच. क्रेद्दोक , जो उस समय भारत सरकार में गृह सदस्य थे , ने सेल्लुलर जेल जाने का फैसला किया और कुछ राजनीतिक कैदियों से बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनी . सावरकर और दुसरे राजनीतिक कैदी - बारिन घोष , नन्द गोपाल , हृषिकेश कांजीलाल और सुधीर कुमार से बातचीत की गयी और फिर उन सबों ने याचिकाएं भी जमा कीं . यह प्रक्रिया ब्रिटिश भारत में सभी राजनीतिक कैदियों के लिए वैध था , ठीक वैसे ही जैसे उन्हें कोर्ट में अपने वकील के माध्यम से अपना  बचाव का मौका मिलता था . क़ानूनी शिक्षा प्राप्त करने के कारण  सावरकर को इसकी अच्छी  जानकारी थी और इसलिए  उन्होंने अपने आप को स्वतंत्र कराने या जेल में अपनी स्थिति बेहतर करवाने के लिए हर प्रावधानों का उपयोग करना चाहा . सावरकर दुसरे कैदियों को भी अक्सर समझाया करते थे कि क्रातिकारियों का प्राथमिक कर्तव्य खुद को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़वाना था जिससे कि वो मातृभूमि की सेवा करने में फिर से जुट सकें .


14 नवम्बर 1913 को क्रेद्दोक को सौपीं अपनी याचिका में सावरकर ने तर्क दिया कि बलात्कार , मर्डर , चोरी और दुसरे अपराधों में सजा पाए आम अभियुक्तों को तो उनके अच्छे व्यवहार के आधार  पर सहूलियतें दी  जाती थी या 6 - 18 महीने के बाद काम करने के एवज  पर उन्हें छोड़ दिया जाता था , लेकिन  'विशेष श्रेणी का कैदी' होने के वाबजूद उनके लिए ये प्रावधान उपलब्द नही थे . बल्कि  अच्छे भोजन और बरताव की मांग पर उन्हें यह कहते हुए इंकार कर दिया गया कि वो एक 'सामान्य दोषी' हैं . वे यदि किसी अन्य भारतीय जेल में होते तो यह सब आसानी से हांसिल किया जा सकता था पर सेल्लुलर जेल में वो साल में एक से अधिक चिठ्ठी भी नहीं  भेज सकते थे  और न ही  अपने परिवार वालों  से  मिल सकते थे .


--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

 चुकि 1909 के   मोर्ले - मिन्टो सुधार के तहत भारतियों को सरकार और शिक्षा में भाग लेने के बेहतर अवसर प्राप्त हुए थे . इसीलिए सावरकर ने अपने याचिका में यह जोर देकर कहा कि उन्हें तब बन्दुक उठाने की जरुरत नहीं रह गयी थी और मुख्य धारा की राजनीति में जुड़ कर और सरकार के साथ मिल कर काम कर भारतियों के लिए बेहतर संवेधानिक भागीदारी को पूर्ण करने में ही उनकी  ख़ुशी थी  .


''मैं किसी प्रकार का विशेष सुविधा नहीं मांग रहा,'' उन्होंने कहा , ''पर राजनितिक कैदी होने के नाते मेरा विश्वास है कि  विश्व के  किसी स्वतंत्र राष्ट्र  में सभ्य प्रशासन इतना तो कर ही सकता है ; इतना नही तो केवल वो रियायत और एहसान जो सबसे कुख्यात और इरादातन  अपराधियों को दिया जाता है ?'' यह  पूर्णरूप से ब्रिटिशों के असभ्य होने का अप्रत्यक्ष मजाक उड़ाने जैसा था .


--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

दुर्भाग्य से सावरकर को उनकी याचिका के लिए दुत्कारने वाले वही मानवाधिकार कार्यकर्त्ता  हैं जो कसाब , याकूब मेमन और नक्सली और उनके वैचारिक सिरमोरों  की पैरवी करते फिरते हैं . याचिका की अंतिम पंक्ति जो विवाद को निमत्रण देता है , उसकी भी व्याख्या किसी से छुपी नहीं है : ''जो शक्तिशाली होता है वह दयालु होने की  जोखिम उठा सकता है और कहाँ कोई उदार माई का लाल लौट कर आया हो फिर  सरकार को माई बाप मानने को रुका है ?'' यह सन्दर्भ बाइबल से लिया गया था , यह कहना ठीक ही होगा कि वो जेलर  के धार्मिक भावनाओं को भड़का रहे थे .इस याचिका की केवल कुछ पंक्तियों के चुनिंदा उद्धरण को , उसके पूर्ण रूप या सन्दर्भ के बिना देखना बौद्धिक मूर्खता है .


मजेदार यह है कि , भारत से वापस जाते हुए क्रेद्दोक ने जहाज पर ही  लिखे अपने रिपोर्ट में कहा कि सावरकर ने जो भी किया उसके लिए उसे ''कोई पछतावा व्यक्त करने या पश्चताप करने के लिए नहीं कहा जा सकता'' . आगे उसने लिखा कि सावरकर काफी महत्वपूर्ण नेता है जिसे भगाने के लिए भारतीय अराजक तत्वों का यूरोपीय धरा उन्हें लम्बे समय से प्रयत्न कर रहा है . यदि उसे सेल्लुलर जेल से बाहर कहीं भी कैद किया जायेगा तो वो फरार होने में कामयाब हो जायेगा . उसके दोस्त आराम से किसी भी द्वीप पर स्टीमर से पहुँच कर और थोड़े पैसे बाँट कर ऐसा करने में सफल रहेंगें . निःसंदेह सरकार ने याचिका ख़ारिज कर दी और सावरकर के लिए कुछ नहीं बदला .

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

प्रथम विश्व युद्ध शरू होते ही , सावरकर ने ओक्टुबर 1914 में दूसरी याचिका दी , जिसमें उन्होंने युद्ध में किसी प्रकार की सेवा जो भारत सरकार को अच्छा लगे , देने के लिए न्योता दिया . उसी याचिका में उन्होंने उन सभी कैदियों के सामान्य रिहाई की गुहार लगाई जिन्हें किसी राजनीतिक घटना के कारण सजा मिली थी . ऐसा कई ब्रिटिश उपनिवेश में किया जाता रहा था .

मजेदार बात यह है कि भारतीय राष्ट्रिय कोंग्रेस ने इस महत्वपूर्ण समय में ब्रिटेन को खुला समर्थन दिया था . जब युद्ध चल रहा था तो महात्मा गाँधी ब्रिटेन में ही थे जहाँ उन्होंने एक चिकित्सीय सेना भी बनाई यह उसी तरह की थी , जैसे उन्होंने बोअर युद्ध (दक्षिण अफ़्रीकी युद्ध) के वक्त ब्रिटेन की मदद करने के लिए बनाया था और यहाँ तक कि इसके लिए उन्होंने गोल्ड मेडल भी जीता . 22 सितम्बर 1914 को जारी एक विज्ञप्ति में गाँधी जी को फिल्ड अम्बुलेंस ट्रेनिंग पुलिस के लिए भी बुलाया गया था . जनवरी 1915 को जब भारत वापस आये तो युद्ध में ब्रिटेन को उन्होंने बिना किसी शर्त के समर्थन दिया क्योकि गाँधी जी को लगता था कि ब्रिटेन अभी मुश्किल परिस्थितियों में है , इसलिए ब्रिटेन को शर्मिंदा होने के लिए छोड़ देना या भारत की आजादी के की लड़ाई को आगे बढ़ाना ठीक नहीं होगा .


उन्होंने कहा कि 'इंग्लैंड की जरुरत' हमारे लिए एक मौका नहीं बनना चाहिए और फिर हमारे द्वारा लम्बे समय से की जा रही मांगों को भी युद्ध के अंत में पूरा किया जायेगा . गुजरात के गाँव - गाँव में घूमते हुए उन्होंने युद्ध में भाग लेने के लिए सैनिकों की न्युक्ति में अंग्रेजों की मदद की . उस वक्त दक्षिण भारत के गावों में सैनिक बनाने के लिए लोगों का अपहरण तक कर लिया जाता था , न गाँधी और न ही कांग्रेस ने कभी इसका विरोध किया . ये सब सावरकर के 1914 वाले याचिका से कितना अलग था ?

5 ओक्टुबर 1917 को राज्य सचिव एडविन शमूएल मोंटागु को दिए याचिका में सवारकर ने मोंटागु - चेल्म्फोर्ड सुधार को संदर्भित करते हुए ब्रिटेन को सीमित स्वशासन और भारतियों के लिए दो सद्नात्मक विधानसभा बनाने की बात को याद दिलाया . यह मांगे विश्व युद्ध में अंग्रेजों के समर्थन के बदले किये गए थे . उन्होंने भारत में होम रुल और भारत को कोमनवेल्थ का स्वतंत्र साथी बनाने की वकालत मजबूती से की . पर अंग्रेजों ने सवैधानिक आन्दोलन न होने का बहाना बनाया , सावरकर ने कहा कि जब देश में कोई संविधान ही नहीं था तो संवेधानिक आन्दोलन कैसे किया जा सकता था ? . लेकिन यदि वास्तव में तब कोई संविधान अस्तित्व लाना हो तो इसके लिए काफी सारा राजनितिक , सामाजिक , आर्थिक और शैक्षिक कार्य करने की जरुरत थी , लेकिन यह तभी किया जा सकेगा जब सभी राजनितिक कैदियों को संतुष्ट किया जाये कि उन्हें अकारण जेल में बंद कर दण्ड नहीं दिया जायेगा . उन्होंने अन्तराष्ट्रीय कानूनों का हवाला दिया जैसे कि रूस , फ़्रांस , आयरलैंड और ऑस्ट्रिया में कैदियों की सजा माफ़ी एक आम प्रक्रिया बन गयी थी , जिसे उन देशों ने सिध्यांत के रूप में भी स्वीकार किया गया था . इस तरह सावरकर ने किसी अच्छे वकील की तरह अपने मामले का जिरह किया .


सबसे महत्वपूर्ण , इस याचिका में उन्होंने विशेष रूप से यह कहा कि ' यदि सरकार को लगता है कि इससे सिर्फ उनके जमानत पर ही असर पड़ेगा तो मुझे कैद में ही रखा जाये ; या यदि उनका नाम एक बड़ी रुकावट बन रहा है तो मेरा नाम लिस्ट से मिटा दिया जाये और दुसरे सभी कैदियों को छोड़ दिया जाये ; इससे मुझे उतनी ही संतुष्टि मिलेगी जितनी कि मेरी रिहाई पर मुझे मिलती .''


क्या ये शब्द कायर और मौकापरस्त ब्रिटिश पर असर डाल सकता था ?


--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

युद्ध कि समाप्ती के साथ ही , राजा जोर्ज पंचम के शाही फरमान के कारण पुरे भारत और अंडमान के सारे राजनितिक कैदियों को इकठ्ठे छोड़ा जाने लगा . बारिन घोस , त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती , हेमचन्द्र दस , सचिन्द्र नाथ सान्याल परमानन्द सहित सेल्लुलर जेल के राजनीतिक कैदियों को , एक निश्चित समय तक राजनीति में न आने की प्रतिज्ञां पर छोड़ दिया गया . इसी तर्ज पर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को भी छोड़ दिया गया जिन्हें 1919 के असहयोग आन्दोलन के वक्त गिरफ्तार किया गया था . जबकि , इस तरह का कोई भी फायदा सावरकर और उनके बड़े भाई कोई नहीं मिला . सावरकर ने उसी समय फिर से याचिका दायर किया लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें फिर भी जेल में ही रखा क्योंकि उन्हें डर था कि सावरकर के बाहर आने के बाद 'अभिनव भारत' का नेतृत्व उनके हाथ में चला जायेगा जो एक बार फिर से क्रन्तिकारी आन्दोलन भड़का सकता था .



इसीलिए 20 मार्च 1920 को , सावरकर ने अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ एक बार फिर से याचिका दायर की . किसी भी याचिका में उन्होंने ये नहीं कहा कि वो अपने विद्रोही अतीत के लिए क्षमा प्रार्थी हैं .


1921 में जब सेल्लुलर जेल बंद होने को आया तो अंग्रेजों ने मई 1921 को सावरकर को रत्नागिरी जेल भेजने का फैसला लिया . उस समय तक , सावरकर ने पोर्ट ब्लेयर जेल में ही अच्छा खासा सुधार कर लिया था - जैसे कि पुस्कालय की स्थापना , सजा पाए लोगों के लिए शिक्षा की व्यवस्था और किसी प्रकार के दवाब के कारण धर्म परिवर्तन की समाप्ति . पर आगे समस्या फिर से बढ़ गयी क्योंकि रत्नागिरी जेल में इन सारी सुविधाओं को उनसे छीन लिया गया , इस तरह वो वहीँ पहुँच गये जहाँ से सजा की शुरुआत हुयी थी . सावरकर ने अपनी पुस्तक 'माय ट्रांसपोर्टेशन ऑफ़ लाइफ' में बताया कि उस वक्त उन्होंने तीसरी बार आत्महत्या करने का फैसला किया , ऐसा फैसला उन्होंने पहले 2 बार सेल्लुलर जेल में किया था . उनका असीम आत्मबल ही था कि वो इस तरह के विचारों से बाहर आ सके , अन्यथा कितने राजनीतिक कैदियों ने अपने आप को फांसी से लटका लिया था और कितने पागल हो गए थे . ऐसी मनःस्थिति में 19 अगस्त 1921 को दी गयी उनकी याचिका उनके टूटे हुए मन और निराशा को दर्शाता है, जिसके कारण उन्होंने राजनीति को त्यागने का फैसला लिया .


3 साल बाद 6 जनवरी 1924 को वो समय आया जब सावरकर को जेल से छोड़ने पर रत्नागिरी जिले के भीतर ही सख्त निगरानी रख उन्हें राजनीति से वंचित रखा गया . उन्होंने अपने जीवन के अगले 13 साल इसी प्रकार व्यतीत किया . पर उन्होंने सामाजिक सुधार के उन कार्यक्रमों को जारी रखा , जिससे जाति प्रथा और छुआछुत को समाप्त किया जा सके . हरिजन आन्दोलन और अम्बेडकर के आह्वान के काफी पहले ही सावरकर ने अंतरजातीय भोज की शुरुआत कर दी थी . इसके आलावा रत्नागिरी में पतीत - पवन मंदिर का निर्माण करवया , जिसमें सभी जातियों के लोग पूजा करते थे .

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------


ऐसा कोई भी विश्लेषण जो सवारकर या उनके जैसे किसी भी स्वातंत्र्य वीर के छवि को धूमिल करती हो उसे कठिन प्रश्नों से गुजारने की जरुरत है .

हमें यह देखना होगा कि कोंग्रेस द्वारा किये गए आन्दोलन से परेशान होकर अंग्रेज ने भारत को छोड़ने का फैसला किया या फिर दुसरे विश्वयुद्ध के बाद उनकी स्थिति बद्तर हो गयी थी . ब्रिटेन को हर उस भारतीय से डर लगता था जिसकी दोस्ती दुसरे देश के नेताओं से थे . वो सुभाष चन्द्र बोष हों या सावरकर . दुसरे विश्व- युद्ध के वक्त भी कांग्रेस ने भारत को आज़ादी देने के शर्त पर ब्रिटेन को समर्थन देना की बात कही थी वहीँ मुस्लिम लीग ने तो ब्रिटेन का सपोर्ट किया था . कोंग्रेस भी ऐसा कर सकती थी पर उस वक्त तक सुभाष बोस का प्रभाव बढ़ गया था .































Thursday, October 11, 2018

Democracy of Elites


VIP-culture and red-tepism have  vigorously became the part of elite section in India . 70 years' passage can be denounced for the protection as well as it's nurture . Current government has taken some necessary step to combat it. Removing beacon from the car of officials and leaders was one of such steps . Apart from that timely reporting to the office  , time driven tasks and outcome based promotion in ministry as well as bureaucracy were some other steps .


Prime Minister does not provokes such tradition but but he is unable to stop other members of his party and alliances from doing the same . There are almost 30 category of VIPs for the concession in security checks on the airports . It was burning example of the very tradition when an MP of Shiv Shena threatened a 60 years old employ of Air India with slippers . The MP should have been fired  from the party for doing so . But irony is that Shiv Shena threatened to create obstacles in the service of Air India . And the Center directed Air India to remove the name of the MP from it's 'NO-FLY' list . Prime-minister was silent on whole episode .

Our judiciary is not so different . According to former CJI Deepak Mishra , there are about 3.3 crore pending cases in various courts of India . In such situation , courts are aspect-ed not to interfere in administrative matters and to concentrate on giving justice . But last week Madras High Court directed to National Highway Authority of India to make a separate que for VIPs on toll-gate . It is obvious that judges of courts also lie under these VIPs . The court told it unfortunate to wait 10-20 minutes .

Yes , no want to wait unnecessary on road but why the court want the segregation of their judges from common man . This order by the court clearly shows VIP – mindset , which has become the part of DNA of ruling class of India . The act is opposite to the definition of democracy given by Abraham Lincoln . Our democracy is the government by elite , of elite and for elite .Image result for red tapism of democracy








Saturday, September 29, 2018

Naxalism is capable to high- head again .


According to the recent statement of  home minister , naxalism is on it's verge . Our believe on the statement refers to the controlled situation in the hand of defense personnel . According to South Asian terrorism portal , 122 naxals have been killed in the first 6 month of 2018 . It highest in recent 8 years . Another evidence of bad situation of naxals is that their stronghold has been diminished to 90 districts from 223 districts .

The way government has executed the plan on the basis of protection and development , is the reason for the control on naxal problem . The government took the step for diminishing poverty along-with building roads , school , mobile tower , bank , post-office in naxal prone reason . A research published by Brooking Blocks says that less than 3 % people of India will be called poor till 2022 . According to a speculation , situation of chronic AND extreme poverty will completely end till 2030 .
Image result for end of naxal
A call-center in Dantewada . 

Government effort is appreciable , and also a sign towards positive future . But in the last 50 years , it has happened 2 times when government has understood it has ended . With the arrest of Charu Mjumedar in 1971 and death of naxal leadership in 1972 end of this terror was deemed to be .


Naxals arose again in 1980 with the formation of Peoples' War Group in Andhra Pradesh and gradually spread in many states . Consternation was on it's height on 1991 , when government strangulated them .


The 3rd stairway of this problem started in 2000 with the formation of Peoples' Guerrilla Army . They dipped their roots by coping with Maoist Communist Party in 2004 . In 2000 , the then prime minister said , ' extremist left is the biggest danger for the country ' while addressing police superintendents .


Despite the strength shown by government to control naxals , but the key reason of the birth of naxalism has not ended . Expert committee of Planning Commission warned in 2008 itself that unequal distribution as well as lack of accessibility of justified opportunities right after independence have created a sense of dissatisfaction  in downtrodden and backwards class of society . Today , on e one hand India has 3rd largest number of billionaire after China and America .i.e.,119 , on other hand , poverty is still in effective existence .


We have slipped down by 2 places in terms of transparency and corruption in world ranking . Corruption is the main reason of dissatisfaction with the deprived . It is estimated that the Maoists have started to build their bases in the North Eastern Region and at the confluence of Kerala, Karnataka and Tamil Nadu .


Government of India now has two ways. First, either they crush the Naxalite movement. In this situation, the possibility of a new incarnation of the problem can be born. Secondly, negotiating with the Maoists and giving away their reasons for dissatisfaction.


The glory of peace is always appreciated by a power accomplishment. There is hope for success in this. Therefore, taking full precautions, the government can make a peace agreement with the Maoists .

Friday, September 28, 2018

WILL BEGGARS WILL BE BEGGARS


Census 2011 states that there are 40 million  beggars in India . Such a large number shows that India has been unsuccessful in fulfilling its role as welfare states . To spur your hand before others , just for two moment bread is like killing your soul by yourself . You must have witnessed people begging near temple , on crossroads . Being a responsible citizens your mind may question over the situation that either these people are in the situation due to their own reason or have been compelled by conspiracy . Irony is that , there is no proper central mechanism regarding this .

Recently , Delhi High Court has ruled off 25 sections of Bombay Prevention of Begging Act . These sections were there to make begging a criminal offense . Along with this High Court has made it unconstitutional to interpret  begging as criminal practice . High Court has ruled this on behalf of two PILs filed regarding the fundamental rights and basic human rights of beggars .


It is matter to be care here that there is no any Central Law regarding begging till now . 20 states and 2 union territories have made law on Bombay Preventing of Begging Act . Delhi is also one of those territory .


Begging can be simply  classified as (i) desired begging and (ii) undesired begging . Many people are there who adopt it due to laziness and weak ea-steam to work . Some of the Indian Tribes adopts it as their tradition . But larger picture is completely inverted . Actually , hunger , poverty and inequality in income are those reason , due to which a class of people are not able to get basic facilities like food , clothes and shelter . This class adopts begging as its substitutes of livelihood in compulsion .


The story of income inequality and chronic hunger in India is clearly represented in various global reports . A report published in December 2017 named World Inequality Reports , says only 10% people have 56 % of total wealth in India . On the other hand Global Hunger Index 2017 published by International Food Policy Re-search Institute palaces India at 100 in the list of 119 countries .


Many a time , some gangs are benefited by these poverty prone people . These gangs run begging in a collective manner . They do it by threatening , by giving greed and sometime by human trafficking of the poor people . Some times they do it even by making them handicapped .


By abolishing 25 sections of Bombay Prevention of Begging Act , High Court has made a meaningful effort to protect the right to life of such poor people . The main provision of this act was to criminalize begging and and giving police the power to arrest such people and deport to some registered organization . Act had included all those persons who used to beg either by singing , dancing , forecasting future or by showing wound or by telling about ills . Apart from these , even to roam  near public places in desire of begging in absence of any means of livelihood , the said law had declared it as begging .

In that law , beggar were sentenced for 3 years when arrested first time and 10 years on 2nd time of arrest and kept in registered organizations . Along with this , dependents of the arrested people could be sent to registered organizations too .

These registered organizations had have many types of power given . For example , to punishment the beggars , to take work form them  . And if anyone would not obeyed , in such cases they could be sent to jail too . Those all provision were included for the purpose to send beggars and leprosy to a certain place for giving them essential  amenities and proper treatment . But it became a powerful weapon against those who were seen to beg due to poverty , compulsion and physical derisiveness . Administration started using it to remove them from public places . For instance , it was used on large scale to drive out beggars from New Delhi during Commonwealth Games 2010 . According to punitive provision of the act , beggars were arrested but the administration  didn't take any sufficient step for their rehabilitation .

The main problem of current law is regarding the definition of begging . For example , earning livelihood by singing , dancing and forecasting future is occupation for some community . Just because these occupation do not tally with the main stream occupation , to declare  it a criminal act is no way justifiably .




Monday, September 24, 2018

Institutes of Eminence need a fair-checks.


Image result for institutes of eminence


Central government had announced to make 10 public and 10 private institution of global standards in 2016 budget . Only 6 universities have been chosen  as 'Institute of Eminence'(IEO) in two years . It seems that IOE is needed to see different perspectives .

After the prime-ministerial announcement , 114 institutions had applied under the said policy . Since select committee has not made the selection criteria public . On this basis , it can be said that the selection process has been done in biased and one-sided manner .

Any university gets years to be well-established . So , government should have given the permission to apply to only to well-establish university . Despite it , government did a mistake by giving the same opportunity to newly formed university .

Select committee ought to have followed the criteria of the ranking which is being followed by global ranking agency . This process give more importance to research . Along with this , it needs to keep international view of teachers , students and syllabus . Every subjects should have given equal weight-age in selection process . But selected institutions shows that the same has not been done . By selecting science and engineering institutions , subjects like humanities and social science have been ignored completely .


China had selected and made effort to evolve by selecting institutes related to research . So those institution has gained global standards . Only 300 universities have made their places in Q S Ranking out of 9000 higher education institutions . And out of these 300 , only 79 has been selected . Unfortunately Indian Select Committee has not chosen ant of these 79 institutions .


About 140 M Indian youth are going to enter in higher education in the coming decade . Only 3 institutions have been placed in top 250 universities in Q S Ranking 2018 . Indian government should learn from International Ranking Agency , and make a pace in selecting more than 6 institutes .

Friday, September 21, 2018

AVATANS KUMAR’s moment in JNU (हिंदी में )

अगस्त की मस्त शाम , मैं जब भाषा विज्ञान स्नातक के रूप में जे एन यू पहुंचा , कुछ अलग पर बेहतरीन सा अनुभव हुआ , जैसे कि मैं किसी अनन्य समाज का पार्ट होऊं . यह इसकी विशिष्ट आभा और उत्कृष्टता ही है जो जे एन यू को कुछ हद तक परिभाषित करता है और उसे भारत के दुसरे विश्वविद्यालयों से अलग करता है . किसी के बारे में त्वरित राय बनाना कितना ठीक है यह मैं नहीं जानता , पर बोलने की आज़ादी , ढाबे पर बैठ वाद - विवाद , भोजनालय में भाषण इत्यादि ऐसी कुछ विशेषतायें थीं , जिन्हें मैंने तुरंत महसूस किया . थोरे दिनों में थोरी गहराई में जाने पर मालूम हुआ कि वह वाद- विवाद की महान परंम्परा , विचार का आदान - प्रदान एक विशिष्ट विचारधारा के सीमा में ही रह कर संभव है . मैं उन छात्रों को कैसे भूलूं जिन्होंने प्रो. मकरंद परांजपे को अशिष्ट रास्ता अख्तियार करते हुए उन्हें कार्यालय जाने से रोका विडिओ लिंक ---https://twitter.com/ARanganathan72/status/828517155477925889 ऐसी घटनाएँ एक उदारवादी और लोकतान्त्रिक शैक्षणिक संस्था के मूल्यों के खिलाफ है . दुनियां के किसी भी लेफ्ट वातावरण का उदहारण लेकर उसे इस सन्दर्भ अर्थात 'फ्री स्पीच' के सन्दर्भ में समझा जा सकता है , आपको वह काफी मायनों में जे एन यू जैसा ही प्रतीत होगा . आखिर यह वही विशष्टता और असहिष्णुता है जिसने मुझ जैसे नवागुन्त्कों को 'धोखेबाज' और 'मद्बुद्धी' कह कर पुकारा क्योकि मैं खांटी जे एन यू मॉडल में फिट नही बैठ सका . इसी विशिष्ट असहिष्णुतावादियों के द्वारा बाबा रामदेव और विवेक अग्निहोत्री को जे एन यू में घुसने तक नही दिया गया . लेफ्ट विंग छात्रों और प्राध्यापकों के भारी विरोध के कारण विश्वविद्यालय प्रशासन को बाबा रामदेव के व्याखान को रद्द करना परा , वो 22 वें अन्तराष्ट्रीय वेदान्त सम्मलेन के मुख्य वक्ता थे . वहीं दूसरी ओर फ़िल्मकार को उनकी फिल्म की आउटडोर स्क्रीनिंग करनी परी , जबकि फिल्म को सौन्दर्य शास्त्र एवं कला संकाय सभागार में प्रदर्शित किया जाना था , जिसे संकाय प्रमुख द्वारा अंतिम समय में रद्द कर दिया गया . कहने की जरुरत नहि है , फिर भी कह देता हूँ कि जे एन यू हमेशा से मार्क्सिस्ट - लेफ्टिस्ट का गड रहा है . विश्वविद्यालय स्थापना वीधेयक संसद में पास होने के तीन वर्ष बाद इसकी स्थापना 1969 में हुई . इसका लक्ष्य , ' राष्ट्रिय एकता , धर्मनिरपेक्षता , सामजिक न्याय , अन्तराष्ट्रीय समझ और सामाजिक समस्याओं को वैज्ञानिक दृष्टी से हल ' था . पर कुछ ही दिनों में ये सारे उदारवादी लक्ष्य , सस्ते राजनितिक लक्ष्यों की पूर्ति के रास्ते बन कर रह गये . उस समय इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी , पर गाँधी- नेहरु की कांग्रेस ने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधि के कारण पार्टी से निकल दिया था , इंदिरा के पास लोकसभा में बहुत से 45 सीटें कम थी , जिसकी पूर्ति के लिए इंदिरा लेफ्ट के तरफ झुकी . बल्कि उन्हें झुकना भी नही पड़ा क्योंकि वो खुद समर्थन देने को आतुर थे , पर सही कीमत पर . सही कीमत , 'समर्थन-समझौता' , 1971 जिसके तहत उस समय के मशहूर शिक्षाविद और खांटी लेफ्ट इतिहासकार सैय्यद नुरुल हसन को भारत का शिक्षा मंत्री बना दिया गया . हसन की नीतियों ने यह निश्चित किया कि जे एन यू लेफ्ट गढ़ बन कर उभरे . प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय के ही पूर्व छार्त्रों पर निर्भर रहने के साथ - साथ वामपंथियों ने सामान विचारधारा के लोगों का स्वस्थ अन्तः प्रसार सुनिश्चित किया . जे एन यू छात्रों के नामांकन के लिए राष्ट्रिय प्रेवश परीक्षा का आयोजन करता है . जिसकी प्रक्रिया और प्रश्नों का प्रारूप इस तरह सेट किया जाता है कि 'अनचाहे'छात्र - छात्राएं अपना पैर न जमा पायें . परीक्षाएं सामान्यत दीर्घ प्रोश्नोत्री होते हैं , ऐसे प्रश्न को जान बूझ कर शामिल किया जाता है कि परीक्षारथी अपनी राजनितिक और विचारधारात्मक पहचान उत्तर में उगल दे . प्रश्नों को देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें -- http://indiafacts.org/selection-engineering-political-filters-in-jnus-admission-process/ वहीँ अपनी ताकत को बरक़रार रखने के लिये विश्विद्यालय प्रशासन अप्रत्यक्ष पर चरणबद्ध तरीके से कुछ खास अध्ययन शाखाओं को खोलने से बचता रहा है . जैसे कि संस्कृत और भारतीय संस्कृति संकाय को खोलने के लिए काफी लोगों ने पुरजोर प्रयास किया . एक महत्वपूर्ण कला संस्थान होनेे के नाते विश्वविद्यालय से यह अपेक्षित है कि संस्थान संस्कृत के विकास के लिए छात्रों को छात्रवृति प्रदान करे . एक ओर जहाँ गैर - भारतीय भाषा विभाग यहाँ प्रारंभ से ही है वहीँ संस्कृत केंद्र को अम्ल में लाने के लिए 30 वर्ष का लम्बा इंतजार करना परा .
मेरे लिए यहाँ का सबसे निराशजनक पहलु , निराशाजनक और नकारात्मक सोच है . समाज कि बुराइयों को बढा-चढा कर बताना , विशेषकर जो हिन्दुओं से सम्बंधित हो . छात्रों को सकारात्मक सोचों से दूर रखा जाता वहीँ हिन्दू संस्कृति , देवी - देवताओं को मजाक उड़ना आम है . *आज़ादी के बाद यदि लेफ्ट द्वारा किये गये आलोचनाओं को ध्यान दें तो शायद आप हैरत में पर जाएँ , क्योंकि इन्होने किया नहि . जब नेहरु ने सोवियत संघ के कठोर कम्युनिस्ट मॉडल को अपनाया , तो इन्होने ख़ुशी मनाई . जब इंदिरा ने संस्थानों का केन्द्रीकरण किया तो इन्होने ख़ुशी मनाई . इंदिरा ने इमरजेंसी लगाई , विरोध गायब . 'करप्शन इज अन्स्टोपेबल' , 'भ्रष्टाचार अदम्य है' , इंदिरा सदन के पटल पर यह कह पाई , कम्युनिस्टों ने उन्हें 'मदर इंडिया' कह दिया . इंदिरा पूर्णतया विदेशी संकल्पना 'सेकुलरिज्म' को वोट बैंक के लिए सविधान में डालती हैं , नो विरोध . सिख विरोधी दंगा , नो विरोध . राजीव गाँधी बोफोर्स में फंसे , इन्होने बचाया . वि पि सिंह ने अदूरदर्शी मंडल के मुद्दे को उठाया , जिससे देश ऐसे दलदल में फंसा कि अब तक निकलना मुश्किल है , आये दिन जाति आधारित पार्टियाँ कुकुरमुत्ता बन कर फट्ट से खरी हो जाती हैं , कमुनिस्ट चुप रहे . जब सोनियां गाँधी को नैतिक रूप से दिवालिया लोगों द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए आगे किया गया , इन्होने चुप्पी साधे रखी . और तो और उन्होंने सडयंत्र कर, पहली बार एक ऐसी प्रणाली विकसित की कि एक पुतला प्रधानमंत्री बना रहे और असल शक्ति सोनिया गाँधी के पास हो . यूँ ही नहि जवाहरलाल नेहरु ने ए आई एस एफ बनने में भूमिका अदा की , इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का विशेष सुविधा प्राप्त पूर्व छात्र होने के नाते मेरी मनोकामना यह है कि यह संस्थान अकादमिकता के सबसे ऊँचे प्रतिमानों पर पहुंचे , पर बिना विचारधारात्मक अतिवाद के बिना .
>* mark वाला पारा विवेक अग्निहोत्री के एक जबाब से लिया गया है जो उन्होंने यूनिवर्सिटी of North Carolina में दिया था .
>ओरिजनल स्तम्भ अंग्रेजी में पढने के लिए क्लिक करें https://www.dailyo.in/user/14433/avatans

Wednesday, September 19, 2018

रूपया समाजवाद और डालर


अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में होने के वाबजूद , सदियों लम्बी देश में चल रहे बदस्तूर लूट के कारण , आजादी के बाद भारतीय मुद्रा वैश्विक स्तर पर अपने मूल्य और स्थिति को बरक़रार रखने के लिए संघर्ष कर रहा था . तभी भारत में समाजवाद का उदय हुआ , सॉरी भारत पर समाजवाद थोपा गया . अच्छा , समाजवाद का मॉडल अपनाया गया . भारत के साथ सिंगापुर ने भी इसे अपनाया था , पर शुरूआती असफलता को देखते ही उसने उसे बाय - बाय कर दिया . भारत असफलता के वाबजूद इसे अपनाने की जिद्द पर ही अडा रहा , भारत नही कोई और इसकी जिद कर रहा था . इसीलिए मैंने शुरुआत में ही कहा कि समाजवाद थोपा गया .


खैर समाजवाद एक ओर जहां भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रहा था वही इसकी बंद प्रकृति का होने के कारण अन्तराष्ट्रीय व्यापार जगत में भी भारत की पूछ कम हो रही थी . व्यापार के नाम पर सिर्फ इम्पोर्ट फिर वो खाद्यान हो या तेल . इस तरह भारतीय मुद्रा को दोहरा झटका लगा .



1959 से 1966 तक भारतीय रिजर्व बैंक ही अधिकतर तेल संपन्न देशों के लिए 'रूपए' का मुद्रण करती थी , जिसे 'गल्फ रूपए' या 'एक्सटर्नल रूपी' कहते थे . डिज़ाइन भारतीय रूपए के सामान ही होता था पर रंग अलग . 1966 तक उपरोक्त कारणों के साथ - साथ चीन का युद्ध ,भारत और इसकी अर्थव्यवस्था को गर्त में ले गया . मारे दवाब में रूपए का अवमूल्यन किया गया . हलाकि इससे पहले ही भारत की खोज करने वाले महापुरुष स्वर्ग सीधार गये , मैं वास्को डिगामा की बात नही कर रहा , हालांकि उसने भी सिर्फ समुद्री रास्ता बताया था .

अब तक 'सऊदी रियाल' डालर के संपर्क में आ चूका था , पर जमीन पर 'गल्फ रूपए' , भारत की मुद्रा के बर्बाद होने तक का प्रसार में रही . ब्रिटिश पोंड भी तेजी से अपनी अन्तराष्ट्रीय जमीन खोती जा रही थी . इससे पहले कि विभिन्न गल्फ देश अपना करेंसी इजाद करते , उसका मुद्रण कर उसे अम्ल में लाते , उन्होंने पहले से सऊदी रियाल के संपर्क में आये , डालर को अपनाया .


इस सबके बावजूद भारत में समाजवाद को थोपने का सिलसिला रुका नहि , ना रुका रूपए का मूल्य ह्रास . 'समाजवाद' को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया , राजनितिक पार्टियाँ इस नाम का वकालत करती रही . समाजवाद के नाम पर मिला क्या - परिवारवाद , भ्रष्टअचार , लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर राजशाही , आपातकाल .



*सरकारी संस्थाएं सही से काम करें , मजबूत अदालते हों , सही कानून हो , इमांदार नेता हो , भागीदारीपरक लोकतंत्र हो , मानवाधिकारों का सम्मान करने वाला और लोगों के जीवन में लोगों को प्रतिनिधित्व देने वाला पारदर्शी प्रशासन हो , तो शायद ही कोई व्यवस्था असफल हो . और ऐसी स्थिति में तो पूंजीवाद भी समाजवाद के सकारात्मक अपेक्षाओं को पूरा कर सकता . यदि समाजवाद की शुरुआती असफलता के बाद ही वैकल्पिक मार्गों पर चलने की कोशिश हो गयी होती , तो दुनियां उदारवाद के नाम पर भारत को ब्लैकमेल नही कर पाती .


सोचिये कि गल्फ देशों में रिजर्व बैंक ऑफ़ इडिया द्वारा मुद्रित मुद्रा का ही प्रसार होता , या फिर डालर के हावी होने से पहले रुपया कमजोर न हुआ होता और गल्फ देश अपनी मुद्रा को इजाद कर उसे अम्ल में ला पाते . हा पर ये सब तभी होता जब भारत की खोज करने वाले उस महापुरुष ने समाजवाद की अंतहीन रट न लगाया होता .


*mark वाला पारा अरुंधती रॉय कि पुस्तक 'न्याय का गणित से प्रेरित  है .